मैंने अपनी रचना में माटी की गंध को पिरोया है ,जो बहुत ही सरल आम बोलचाल की अपनी मातृ भाषा है ,हम खड़ी हिंदी बोलते हैं पर दिल के करीब अपनों के बीच की यह स्नेहमयी भाषा है । इन सभी रचनाओं पर पूर्ण रूप से मेरा अधिकार है तथा इनके किसी भी रूप में उपयोग के लिए मेरी स्वीकृति अनिवार्य होगी । शैल सिंह
सोमवार, 14 मार्च 2022
सीमा पर तैनात जवान की पत्नी का दर्द होली पर
रविवार, 24 अक्टूबर 2021
'' भजन '' श्याम कैसी तड़प की सजा दे गया ,
प्रीत की जोत दिल में जला के
चैन चितचोर कान्हा उड़ा ले गया
मधुर मुरली की धुन पे नचा के
राधा रानी को छल के दगा दे गया ,
कब आयेंगे मोहन बता के तो जाते
याद में राह तकते न हम तड़फड़ाते
जाने कैसी व्याधि तन-मन लगा के
श्याम कैसी तड़प की सजा दे गया ,
रस भरी चितवन से मोहा मुरारी
फँस गईं अँखियाँ निगोड़ी बिचारी
विरही बावरी चितेरा बना के
हाय कलेजे पे बरछी चला के गया ,
नम नयन गोपी ग्वाले तुम्हारे बिना
क्यों तर-बतर रास रंग में डूबा के
लीलाहारी तूं लीला दिखा के गया ,
कदम छईंया हैं बैठीं गैयाँ उदासी
बाट तेरा निहारें अंखियाँ ये प्यासी
नख से शिख नाम अपना लिखा के
विछोह के पीर से क्यों सता के गया ,
जाके कहना संदेशा ऊधो जिया की
सुध गए भूल क्यों याद आती पिया की
सांवरा सूरतिया हिया में बसा के
श्याम मनिहारी ठग बन रिझा के गया ।
शैल सिंह
शनिवार, 23 अक्टूबर 2021
मत पेट पे लात चला देना
मेघ बरसना चाहे जितना तुम मेरी मड़ई का ध्यान रहे
हम अपना नीड़ बचाने में दिन रात ढिहनाते रहते हैं
कड़के कभी जो दामिनी प्राण पात पर अटके रहते हैं,
किसी-किसी के जीवन में सुख ही सुख भर देते मेघ
और किसी के कोढ़ में खाज आफ़त सी भर देते मेघ,
उपले,गोंइठा,लौना-लकड़ी कहीं मत ग्रास बना लेना
राजे-रजवाड़ों के घर जाकर महल अटारी पर बरसो
हो तुम उनके लिए सुहावना मौसम दरबारी कर हर्षो,
खलिहान,खेत तो बहा ले गये लटका है सूली पे प्राण
कहीं सूखे से लोग बेहाल कहीं बरसते तुम मूसलाधार
शैल सिंह
रविवार, 22 दिसंबर 2019
भोजपुरी में मेरी एक रचना एक सैनिक की पत्नी का करुण विलाप
एक सैनिक की पत्नी का करुण विलाप
सुनसान लागे भवनवाँ
झनके अँगनवाँ
निसदिन विछोह में
ढरके नयनवां
जल्दी छुट्टी लेके आजा
घरवा सजनवां,
गहि-गहि मारेलीं
सासु रानी तनवाँ
सहलो ना जाये हाय
छोटी ननदो के मेहनवां
लहुरा देवरवा रगरी
हवे बड़ा शैतनवां
हुक़्क़ा नियर बड़बड़ालें
ससुरु बइठि दुवरवा
जल्दी छुट्टी लेके आजा
घरवा सजनवां,
विरही कोइलिया करे
राग धरि बयनवां
पापी पपीहरा के
सुनि पिहकनवां
ड्योढ़ी अस पिंजरा में
बंद जईसे हईं सुगनवाँ
भीतर-भीतर तड़फड़ाला
हिया के मयनवां
जल्दी छुट्टी लेके आजा
घरवा सजनवां,
भावे ना सिंगार तन
विरावेला गहनवां
देहिया जरावे चन्दा
उतरि के अँगनवाँ
सिमवा पर जिया देई-देई
तजि देबा परनवां
आ चैनवां क नींद सूतिहें
सगरो जहनवां
जल्दी छुट्टी लेके आजा
घरवा सजनवां
नईहरे ना मई-बाप
ना एकहु विरनवां
गांव गोईड़ार छूटल
तोहरे करनवां
सखियां सहेलियाँ भी
गईलीं गवनवाँ
गोदिया में खेलें उनके
सुघर सलोना ललनवां
जल्दी छुट्टी लेके आजा
घरवा सजनवां।
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शैल सिंह
शुक्रवार, 9 अगस्त 2019
" महके तेरे गंध सी मह-मह पुरवाई "
रूत सावन है अलमस्त सुहावन
भरे उमंग,तरंग लगे उर वृन्दावन
रैना अंधेरी जले जुग-जुग जुगनूं
भरे प्रकृति में है ख़ुश्बू मनभावन ।
नभ छाई घटा घनघोर बलमु जी
तड़क-तड़क तड़ गरजे बिजुरी
मग आँखें बिछा तकूं राह तेरी
घर आओ पिया,संग खेलूं कजरी ।
ले मदमस्त सवनवां जब अंगड़ाई
उठे सरर-सरर-सर्र मन में हिलोरा
महके तेरे गंध सी मह-मह पुरवाई ।
ओढ़ हरी चूनर लहकें वन-उपवन
पी संग चंचल शोख़ हुईं सखियां
बूंदों की छम-छम से गूंजे सरगम
टह-टह सहन में छिटकी चंदनियां ।
तुम बिना प्रीत भरा अंजन,कजरा
कौन देखे कंगन,केश सजा गजरा
बजे छन-छन पांव पाजेब निगोड़ी
लगे बिरथ सिंगार रची द्वार रंगोली ।
तन सुलगाती विराग में साजन की
बरसे रिम-झिम कारा बावरा बदरा
समेटती फुहरा,मुदित पसरा अंचरा ।
सुधि में तपती देख आ छूके मस्तक
लगे जीवन पहाड़ रैना दिवा सरीखी
मारे डंक सेज लगे घर सूना अबतक ।
सर्वाधिकार सुरक्षित
शैल सिंह
मंगलवार, 29 मई 2018
गांव-शहर पर भोजपुरी में मेरी एक रचना
गांव-शहर पर भोजपुरी में मेरी एक रचना
कत्तों नाहीं देखलीं वइसन शहर बीचे ठांव हो ,
हनल केवाड़ी जंगला सब कर रहे दिनों राति
केतनों झंकलीं अगल-बगल केहू ना देखाला
जइसे गंउंवां में हमरे पग-पग लोगवा भेंटाला
तरस जाला जियरा केहु ना मिले बतियावे के
चला देख गउंवां हमरे मन करि नाहिं आवे के ।
कब चिरई चह-चहके कब देला मुर्गा बांग हो
ना त केहु हाथे देखलीं कटोरवा दूध भात के
ना केहु से मेल-मिलापा लेन-देन व्यवहार हो
चला देखा गंउंवां विहँसे लगे रोज त्यौहार हो ।
होला गदबेला कब चकोर-चन्दा में दिल्लगी
लागे नाहिं रहेला एहमे केहू एको इन्सान हो ।
गुरुवार, 10 मई 2018
श्याम भजन
मेरे द्वारा रचित---श्याम भजन
जुबां नाम रटे तेरा सुबहो-शाम राधेश्याम
राधेश्याम,राधेश्याम,राधेश्याम,राधेश्याम
तेरी चौखटों पे सिर नवा नित करूं प्रणाम
सुबहो-शाम राधेश्याम,राधेश्याम,राधेश्याम ।
सजा आरती का थाल लिए चारों ही प्रहर
अभिलाषी दरश की मैं फिरूं इधर से उधर
इक बार प्रकट होकर दरश दे दो घनश्याम
विमल चरणों के स्पर्श में करलूं चारों धाम
जुबां नाम रटे तेरा सुबहो-शाम राधेश्याम
राधेश्याम,राधेश्याम,राधेश्याम,राधेश्याम ।
तेरे प्रेम की दीवानगी में घर-बार छोड़कर
शरण तेरा चाहूँ बन्धनों की गांठ खोलकर
लिप्त भजन में तेरे मैं गर हो जाऊं बदनाम
मीरा बावरी सी हो जाएगा मेरा अमर नाम
जुबां नाम रटे तेरा सुबहो-शाम राधेश्याम
राधेश्याम,राधेश्याम,राधेश्याम,राधेश्याम ।
वनांचलों में खोजा हेरा गिरि कन्दराओं में
पशु-पक्षियों से पूछा,हेरा परेशां हवाओं में
कहाँ मुरली माधव तुम गिरधर अन्तर्ध्यान
नैना तरसें तृप्त कर दो यूँ करो ना परेशान
जुबां नाम रटे तेरा सुबहो-शाम राधेश्याम
राधेश्याम,राधेश्याम,राधेश्याम,राधेश्याम ।
ढूंढूं कुन्ज गली में मैं तुझे मथुरा गली में
बृन्दावन में ढूंढा,ढूंढा तुझे द्वारिकापुरी में
मनमंदिर में मेरे प्रभु मूर्ति तेरी विराजमान
इस बात से ही मैं भला रही क्यूं अनजान
जुबां नाम रटे तेरा सुबहो-शाम राधेश्याम
राधेश्याम,राधेश्याम,राधेश्याम,राधेश्याम।
शैल सिंह
सर्वाधिकार सुरक्षित
