शुक्रवार, 24 अक्टूबर 2025

स्वरचित भोजपुरी 'निर्गुण'


नैना रतनारी ढूरे अबहीं बानी सुकुमारी हो
कईसे क सहाई दुःखवा मन अति भारी हो । 

गवना के सुदिनवां आईल दिन दुई चारी हो 
नईहर के नगरिया छूटी बाबा के ओसारी हो 
सुपली मऊनियां छूटिहें ,सखी सहेलारी हो 
पोखरा इनरवा छूटिहें ,छूटिहें फुलवारी हो । 

दुवरा पर आईल डोली जाएके ससुरारी हो 
आवा अम्मा धई लीहीं तोहे अँकवारी हो 
सुबुकि-सुबुकि कहें अम्मा के दुलारी हो 
आँखि के पुतरिया काहे दिहलू बिसारी हो । 

सजन कंहरवा संग बईठेलं मोहारी हो 
आवा चाची धई लीहीं तोहे अँकवारी हो 
बभना मुहूरत काढ़े पोथिया उचारी हो 
आवा भऊजी भरी लीहीं तोहे अँकवारी हो । 

छछनि छछनि रोवें ओहार देली टारी हो 
नीमि के चिरईया काहें दिहला ऊढ़ारि हो  
कवने कुसुरवा बाबा कईला कुलारी हो 
विरना के दिहला काहें महल अटारी हो । 
                                                            शैल सिंह

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें