शुक्रवार, 24 अक्टूबर 2025

मत हमसे हमारी उमर पूछिये


उमंगें तरंगें जवां धड़कनें हैं अभी
अभी अंगड़ाईयाँ लेतीं हिलोरें घनी
मत हमसे हमारी उमर पूछिये ।

धुँधला जाये जिसे देख जौहरे-आईना
अभी भी बसद रंग हृदय के आबाद हैं
कल्पनाओं का व्यापर करती नहीं मैं
महफ़िलों में अभी भी नूर की धाक है

मन के सितारों का चमकता गगन देखिये
मत हमसे हमारी उमर पूछिये ।

रंग और रेशा शरीर के हैं जर्जर मगर
उजले केशों में शक्ति की वही धार है
वहशत वही आज़ भी मेरे हर लम्स में
जीस्त वही आज भी अज्जाए-बहार है

ढली साँझ,चांदनी का खुशरंग जुनूँ देखिये
मत हमसे हमारी उमर पूछिये ।

सदा वंचित रखा खुद को जिस बात से
क़ायम रिश्ता था भींगती सांवली रात से
बेमक़सद गंवाई जिंदगी जो मैनें दहर में 
अभागिन इच्छाएं जागी अब हो मुखर हैं 

मौज़-ए-खूँ देखिये बस रंगे-तरब देखिये
मत हमसे हमारी उमर पूछिये ।

मलय-मारुत लजाएँ गति वही आज भी
इन हाथों भुजाओं में है बल वही आज भी
धुंधला गई रौशनी जर्जर मलिन गात है
ज़िन्दा हासिल-ओ-लाहासील ज़ज्बात हैं

नंगे-पीरी शर्मा जाये नैरंगे-नज़र देखिये
मत हमसे हमारी उमर पूछिये ,

क्यों पोपले मुँह पर देख आड़ी झुर्रियाँ
काया की देख ठहरी शिथिल शक्तियाँ
ढले यौवन की देखते क्यों पीत पत्तियाँ
नकारने से पहले जरा देखिये सुर्खियां

गर्दिशे-अय्याम मगर हुस्न-मह देखिये
मत हमसे हमारी उमर पूछिये ,

निर्वहन करते-करते दायित्वों की श्रृंखला
कृषकाय जवां दिल की,तन की हुई मेखला
हसरतों के द्वार दबी थी जो अधखिली कली
आज फ़ुर्सत में मुरादों की देखो बांछें खिली

गई ऋतु में भी आलम मुझमें वही देखिये
मत हमसे हमारी उम्र पूछिये ।
                                          शैल सिंह

शब्द अर्थ ---
जौहरे-आईना--दर्पण की चमक , बसद रंग--सैकड़ों रंग
लम्स--रोयां , अज्जाए-बहार--वसंत ऋतु
मौज़-ए-खूँ --रक्त की तरंग , रंगे-तरब--आनंद का परिवर्तनशील रंग
हासिल-ओ-लाहासील--प्राप्य और अप्राप्य
नंगे-पीरी --वृद्धावस्था को लज्जित करने वाली
नैरंगे-नज़र--दृष्टि का सौंदर्य , गर्दिशे-अय्याम--दिनों का फेर
हुस्न-मह--चाँद का सौंदर्य 

शबरी भजन

बस गये मन में राम शबरी करती है ध्यान
ध्यान में राम राम बस मन में राम नाम बस गये ----।

लम्बे केश खोल राह झाड़ती बुहारती 
आस में बिछाये आँख राह है निहारती 
इस राह चलके आयेंगे विश्वास है भगवान बस गये ---
ध्यान में राम राम बस मन में राम नाम ,बस गये ----।

जंगलों से तोड़ बेर फांड़ भर लाती
चख के मीठे-मीठे बेर दोनियां सजाती 
करेंगे भोग प्रेम से विश्वास है भगवान,बस गये ----
ध्यान में राम राम बस मन में राम नाम बस गये ----।

कुश की चटाई शबरी नेह से संवारती 
मगन हो भजती राम नाम राम को पुकारती 
करेंगे धन्य आसन विश्वास है श्रीराम,बस गये ----
ध्यान में राम राम ब राम नाम मन में बस गये ----।

शैल सिंह 


 



स्वरचित भोजपुरी 'निर्गुण'


नैना रतनारी ढूरे अबहीं बानी सुकुमारी हो
कईसे क सहाई दुःखवा मन अति भारी हो । 

गवना के सुदिनवां आईल दिन दुई चारी हो 
नईहर के नगरिया छूटी बाबा के ओसारी हो 
सुपली मऊनियां छूटिहें ,सखी सहेलारी हो 
पोखरा इनरवा छूटिहें ,छूटिहें फुलवारी हो । 

दुवरा पर आईल डोली जाएके ससुरारी हो 
आवा अम्मा धई लीहीं तोहे अँकवारी हो 
सुबुकि-सुबुकि कहें अम्मा के दुलारी हो 
आँखि के पुतरिया काहे दिहलू बिसारी हो । 

सजन कंहरवा संग बईठेलं मोहारी हो 
आवा चाची धई लीहीं तोहे अँकवारी हो 
बभना मुहूरत काढ़े पोथिया उचारी हो 
आवा भऊजी भरी लीहीं तोहे अँकवारी हो । 

छछनि छछनि रोवें ओहार देली टारी हो 
नीमि के चिरईया काहें दिहला ऊढ़ारि हो  
कवने कुसुरवा बाबा कईला कुलारी हो 
विरना के दिहला काहें महल अटारी हो । 
                                                            शैल सिंह

मंगा द रंग केसरिया पिया ना,

आज की हवा बड़ी सुहानी लग रही है 
           कैसे ना बहूँ सुनामी की इस लहर में 
           ये सुनामी भी बड़ी रूहानी लग रही है 
           ख़ुशियों पर अंकुश लगाना बड़ा मुश्किल 
           ये लहर भी विरोधियों को कहानी लग रही है ।

जैसे कि——-

भगवा रंग में हम रंगाईब चुनरिया पिया
मंगा द रंग केसरिया पिया ना

ले हाथे में कमल क झंडा 
जाईब हम नहाये गंगा
जी भर देखबैं काशी हम नगरिया पिया
मंगा द रंग केसरिया पिया ना,

सुनके बाबा क प्रचंड जीत 
बजाईब ढोल गाईब गीत 
जाके बुलडोज़र बाबा के शहरिया पिया
मंगा द रंग केसरिया पिया ना,

ख़रीद दा एक ठो गाड़ी
रंग केसरिया पहिनी साड़ी
दौड़ाईब वेग में चतुर्भुज डगरिया पिया
मंगा द रंग केसरिया पिया ना,

अबहीं त बाटे होली दूर
जनता जीत के नशा में चूर
भरि मारे हैं गुलाल पिचकारिया पिया
मंगा द रंग केसरिया पिया ना,

बहे अईसने बयार जुग-जुग 
चढ़े अईसने ख़ुमार जुग-जुग 
रहे अईसने भगवा क लहरिया पिया 
मंगा द रंग केसरिया पिया ना,

यूपी में कहे का बा नेहवा
देखले आ बाबा क जलवा
जाई चकरा अन्हरो क नज़रिया पिया
मंगा द रंग केसरिया पिया ना,

चतुर्भुज---एक्सप्रेस हाईवे
 
                               शैल सिंह

होली गीत



गाल मलो ना गुलाल मोरे बांके रसिया
हँसेगी रूप देखी देखि  म्हारो सारी संखिया,

ना करो बरिजोरी ना कलईया मरोरो
भरी-भरी चूड़ी  हाथ कांच की ना तोरो
दूर बाट होती  रात बरसाने  घर मोरो
छोड़ो ना डगर यॆ  डरावे कारी रतिया
हँसेगी रुप…… ।

रैना अँधेरी बिजुरी चम-चम चमके
कैसे आऊं चोरी पायल छन-छनके
नन्द गली में ठाढ़े ग्वाले बन-ठनके
घर-घर होगी जाने कित-कित बतिया
हँसेगी ...............।

कारो-कारो बदरा बरस रह्यो रूम-झूम
जिया भरमावे है बंसुरिया मधुर धुन
छैल-छबीला करे जादू,टोना चुन-चुन
धीर नाहीं नींद नैना मारी गयी मतिया
हँसेगी ...............।

सोमवार, 1 सितंबर 2025

मीरा भजन

मैं तो चली वृन्दावन धाम 
जहां मेरे श्याम पिया का गांव 
कि आग लगे राणा तेरे महलों में -३
तूमने जो भेजा राणा विष का प्याला
पी गई हंस हंस रट गिरधर की माला
ना मैं चाहूं महला दुमहला अटारी
मन में तो बसा बस मेरा बनवारी 
राजपाट सब छोड़ छाड़कर
लाज शरम तोड़ निकले पांव ,कि आग लगे राणा------
मैं तो चली ------
लगी धुन श्याम की बन गई जोगन
रत हरि भजन में निमग्न मगन मन
कुछ लोग कहें मोहे पगली दीवानी 
देखो बावरी हो गई महलों की रानी 
ले कर करतल एकतारा भजूं श्याम 
गम नहीं दुनिया करे बदनाम,कि आग लगे राणा -----
मैं तो चली -------
मीरा कर गई जग में नाम अमर
भक्तिरस का निर्मल भाव परस कर
युगों-युगों तक सुमिरेगा हर प्राणी 
मीरा की प्रेमरस भीगी अमृत वाणी
मैं भी आई प्रभु तेरे शरण चरण में  
दे दो मुझको भी वृन्दावन ठांव
कि बसा के रखूं निस दिन नयनों में 
मैं तो चली वृन्दावन धाम 
जहां मेरे श्याम पिया का गांव 
कि आग लगे राणा तेरे महलों में -३




बुधवार, 26 जुलाई 2023

आजा घर परदेशी करती निहोरा 

आजा घर परदेशी करती निहोरा 

सावन  की  कारी  बदरिया  पिया 

तेरी यादों का विष पी  नागिन हुई ।


नाचें मयूरी मोर पर फहरा-फहरा 

पिउ-पिउ बोले वन पापी पपिहरा 

कुहुके कोयलिया हूक उठे हियरा

दहकावे तन-वदन निरमोही बदरा 

सावन की विरही  कजरिया पिया 

तेरी यादों का विष पी  नागिन हुई ।


सुध-बुध दिये सकल पिया बिसरा 

नैना से लोर ढूरे बहि जाये कजरा 

झूला न कजरी सखिन संग लहरा 

चिन्ता अंदेशा में काया गई पियरा

सावन की  टिसही सेजरिया पिया 

तेरी यादों का  विष पी नागिन हुई ।


बौरा बरसाये नभ झर-झर फुहरा 

सिहरे कलेजा भींजा जाये अंचरा 

भावे ना रूपसज्जा सिंगार गजरा 

आजा घर परदेशी करती निहोरा 

सावन की कड़के बिजुरिया पिया 

तेरी यादों का विष पी  नागिन हुई ।


उड़-उड़ बैइठे कागा छज्जे मुँड़ेरा 

चिट्ठी ना संदेश दे शूल चुभे गहरा 

बाबा सुदिन टार फेरि दिये कंहरा 

लागे ना नैहर में कंत बिना जियरा 

सावन की पिहके पिरितिया पिया 

तेरी यादों का  विष पी नागिन हुई ।

सर्वाधिकार सुरक्षित 

शैल सिंह