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मैंने अपनी रचना में माटी की गंध को पिरोया है ,जो बहुत ही सरल आम बोलचाल की अपनी मातृ भाषा है ,हम खड़ी हिंदी बोलते हैं पर दिल के करीब अपनों के बीच की यह स्नेहमयी भाषा है । इन सभी रचनाओं पर पूर्ण रूप से मेरा अधिकार है तथा इनके किसी भी रूप में उपयोग के लिए मेरी स्वीकृति अनिवार्य होगी । शैल सिंह
मंगलवार, 25 अगस्त 2026
कवने कुसुरवा बाबा कईला कुलारी हो
बुधवार, 25 मार्च 2026
भजन
शुक्रवार, 24 अक्टूबर 2025
शबरी भजन
मंगा द रंग केसरिया पिया ना,
होली गीत
सोमवार, 1 सितंबर 2025
मीरा भजन
बुधवार, 26 जुलाई 2023
आजा घर परदेशी करती निहोरा
आजा घर परदेशी करती निहोरा
सावन की कारी बदरिया पिया
तेरी यादों का विष पी नागिन हुई ।
नाचें मयूरी मोर पर फहरा-फहरा
पिउ-पिउ बोले वन पापी पपिहरा
कुहुके कोयलिया हूक उठे हियरा
दहकावे तन-वदन निरमोही बदरा
सावन की विरही कजरिया पिया
तेरी यादों का विष पी नागिन हुई ।
सुध-बुध दिये सकल पिया बिसरा
नैना से लोर ढूरे बहि जाये कजरा
झूला न कजरी सखिन संग लहरा
चिन्ता अंदेशा में काया गई पियरा
सावन की टिसही सेजरिया पिया
तेरी यादों का विष पी नागिन हुई ।
बौरा बरसाये नभ झर-झर फुहरा
सिहरे कलेजा भींजा जाये अंचरा
भावे ना रूपसज्जा सिंगार गजरा
आजा घर परदेशी करती निहोरा
सावन की कड़के बिजुरिया पिया
तेरी यादों का विष पी नागिन हुई ।
उड़-उड़ बैइठे कागा छज्जे मुँड़ेरा
चिट्ठी ना संदेश दे शूल चुभे गहरा
बाबा सुदिन टार फेरि दिये कंहरा
लागे ना नैहर में कंत बिना जियरा
सावन की पिहके पिरितिया पिया
तेरी यादों का विष पी नागिन हुई ।
सर्वाधिकार सुरक्षित
शैल सिंह