गांव-शहर पर भोजपुरी में मेरी एक रचना
कत्तों नाहीं देखलीं वइसन शहर बीचे ठांव हो ,
हनल केवाड़ी जंगला सब कर रहे दिनों राति
केतनों झंकलीं अगल-बगल केहू ना देखाला
जइसे गंउंवां में हमरे पग-पग लोगवा भेंटाला
तरस जाला जियरा केहु ना मिले बतियावे के
चला देख गउंवां हमरे मन करि नाहिं आवे के ।
कब चिरई चह-चहके कब देला मुर्गा बांग हो
ना त केहु हाथे देखलीं कटोरवा दूध भात के
ना केहु से मेल-मिलापा लेन-देन व्यवहार हो
चला देखा गंउंवां विहँसे लगे रोज त्यौहार हो ।
होला गदबेला कब चकोर-चन्दा में दिल्लगी
लागे नाहिं रहेला एहमे केहू एको इन्सान हो ।
